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सोमवार, 24 सितंबर 2012

शिव-विष्णु का अलौकिक प्रेम



ये कहानी मैं इसलिए लिख रही हूं ताकि शिव निन्दा करने वाले वैष्णव और विष्णु की बुराई करने वाले शैव इस कहानी को पढकर अपनी राय  बदले और इस कहानी का आनन्द ले । ये कहानी 'कल्याण' नामक पत्रिका से ली गई हैं ।

                                  
                            
                                     एक  समय की बात है की महर्षि गौतम भगवान शंकर को खाने पर आमंत्रित किया । उनके इस आग्रह को शिव जी ने स्वीकार कर लिया उनके साथ चलने के लिए भगवान विष्णु  और ब्रह्मा जी भी तैयार हो गए ।महर्षि के आश्रम मे पहुच कर तीनो वहाँ बैठ गए ।भोले बाबा और श्री हरी विष्णु एक शय्या पर लेटकर बहुत देर तक प्रेमालाप करते रहे ।इसके बाद उन दोनो ने आश्रम के पास ही एक तालाब मे नहाने चले गए वहा पर भी वे बहुत देर तक जलक्रीडा करते रहे ।भगवान शिव जी ने पानी मे खडे श्री हरी पर  जल की कोमल बुन्दो से प्रहार किया इस प्रहार को विष्णु जी सहन ना कर सके और अपनी आँखें मुँद ली। इस पर भी भगवान शिव जी को संतोष नही मिला और वे झट से कुदकर वे विष्णु जी के कंधे पर चढ गए और भगवान विष्णु को कभी पानी मे दबा देते तो कभी पानी के उपर ले आते इस प्रकार बार-बार  तंग करने पर विष्णु जी ने भी अब शिव जी को पानी मे दे मारा । दोनो के इस प्रकार के खेल को देखकर देवता गण हर्षित हो रहे थे और दोनो की लीला को  देखकर मन ही मन उन्हे  प्रणाम कर रहे थे।

                                     उसी समय नारद जी वहाँ से गुजर रहे थे ये लीला देखकर वे सुंदर वीणा बजाने लगे और गाना भी गाने लगे उनके साथ शिव जी भी भीगे शरीर मे ही सुर से सुर मिलाने लगे फिर तो विष्णु जी भी पानी से बाहर आकर म्रदंग बजाने लगे ।जब ब्रह्मा जी ने स्वर सुना तो फिर वे भी मस्ती के इस क्रम मे शामिल हो गए।बची-खुची जो भी कसर थी वो श्री हनुमान जी ने पुरी कर दी जब वे राग आलापने लगे तो सभी चुप हो कर शान्ति से उनका संगीत सुनने लगे ।सभी देव,नाग,किन्नर,गन्धर्व आदि उस अलौकिक लीला को देख रहे थे और अपनी आँखें धन्य कर रहे थे।

                                     उधर महर्षि गौतम ये सोचकर परेशान थे कि स्नान को गए मेरे पुज्य अतिथि गण अब तक क्यो नही आए उन्हे  चिन्ता हो रही थी और इधर तो भगवान को धमाचोकड़ी मचाने से फुर्सत कहा। सब एक दुसरे के गाने बजाने मे इतने मगन थे कि उन्हे ये भी याद न रहा कि वे महर्षि गौतम के अतिथि  बन यहाँ आए हैं ।फिर महर्षि गौतम ने बड़ी ही मुश्किल से उन्हे भोजन के लिए मनाया  आश्रम लेकर आए और भोजन परोसा ।तीनो ने भोजन करना शुरु किया ।इसके बाद हनुमान जी ने फिर संगीत गाना शुरु कर दिया।सुर मे मस्त शिव जी ने अपने एक पैर को हनुमान जी के हाथों पर और दुसरे पैर को हनुमान जी सीने,पेट,नाक,आँख आदि अंगो का स्पर्श कर वही लेट गये।यह देखकर भगवान विष्णु ने हनुमान से कहा - "हनुमान तुम बहुत ही भाग्यशाली हो जो शिव जी के चरण तुम्हारे शरीर को स्पर्श कर रहे है ।जिस चरणो की छाव पाने के लिए सभी देव-दानव आदि लालायीत रहते है उन चरनो की छाव सहज ही तुम्हे प्राप्त हो गये है । अनेक साधु-संत और कई साधक  जन्मो तक तपस्या और साधना करते है फिर भी उन्हे ये शौभाग्य प्राप्त नही होता।मैंने भी सहस्त्र कमलो से इनकी अर्चना की थी पर ये सुख मुझे भी न मिला। आज मुझे तुमसे इर्श्या का अनुभव हो रहा हैं ।सभी लोको मे यह बात सब जानते है कि नारायण भगवान शंकर के परम प्रितीभाजन है पर यह देखकर मुझे संदेह-सा हो रहा है।"  यह सुन कर भगवान शिव शंकर बोल उठे - "हे नारायण ये क्या कह रहे है आप तो मुझे प्राणो से भी प्यारे है। औरो की क्या बात है देवी पार्वती भी आपसे अधिक प्रिय नही है मेरे लिए आप तो जानते ही है।"

                                        भगवती पार्वती जी उधर कैलाश मे ये सोचकर परेशान हो रही थीं कि आज कैलाशपति शिव जी कहा चले गये कही मुझे से रुठकर तो नही चले गये।यह सोचकर देवी पार्वती शिव जी को ढुढते- ढुढते आश्रम पहुचे और पता चला कि मेरे स्वामी शिव जी, विष्णु जीऔर ब्रह्मा जी महर्षि गौतम के यहा मेहमानी मे गये हैं ।वे भी महर्षि गौतम का परोसा खाना खाया । इसके बाद विनोदवश देवी पार्वती शिव जी के वेश-भुशा को लेकर हंसी उड़ाई और बहुत सी ऐसी बाते कही जो अक्सर पति पत्नि प्रेम से एक दुसरे को कुछ भला बुरा कहते रहते हैं।ये बात सुनकर भगवान विष्णु जी से रहा नही गया और वे बोल उठे - "देवी! ये आप क्या कह रहे है।मुझसे आपकी बात सही नही जा रही। जहाँ शिव निन्दा होती है वहाँ मैं प्राण धारण कर नही रह सकता।" इतना कहकर श्री हरी ने अपने नाखुनो से अपने ही सिर को फाड़ने लगे ।यह देखकर सभी ने उन्हे रोकने की कोशिश की पर वे नही मान रहे थे फिर शिव जी के अनुरोध पर वे रुके।

                                         इनके इस प्रेम को देखकर हमे ये समझना चाहिए कि ये दोनो किसी भी प्रकार से अलग नही है फिर हम किस कारण विवाद करते है किसी को श्रेष्ठ और किसी को निम्न कहते है ।क्या ऐसा सोचना हमारी मुर्खता नही। मैं इन दोनों के प्रेम को हजारों बार प्रणाम करती हूं।

      
    ***जय शिवहरी***
 
                                                                       
                                                                                                                                             [तस्वीरें गूगल के सहयोग से]

शुक्रवार, 21 जनवरी 2011

एक परिचय: भारतीय देवी-देवताओं की


यूँ तो विश्व में अनेक सभ्यता एवं संस्कृतियों ने जन्म लिया परन्तु समय के साथ लगभग सभी सभ्यताएँ अपनी विशेषताएँ एवं पहचान खोती चली गयी परन्तु यदि कहीं वह संस्कृति एवं सभ्यता जीवित है तो वह भारत एवं चीन में है, क्योंकि यहाँ की सभ्यता में वह अद्भुत क्षमता है जो वक्त के साथ बदलती परिस्थितियों के अनुरूप ढलती जाती है और विश्व-बंधुत्व की नीति का अनुशरण करते हुए अपने में सभी को समाहित करती जाती है आज के २१ वीं सदी के भारत में भी हम सिन्धु-घाटी सभ्यता को यहाँ के धर्म, रीति-रिवाज, जीवन-शैली तथा परिधानों में देख सकतें हैं
जैसा की हम सभी जानतें हैं की सिन्धु-घाटी सभ्यता विश्व की सबसे पूरानी सभ्यता है जो अपने उत्कर्ष-काल में काफी समृद्ध एवं उन्नत थी यह सभ्यता अपने वाणिज्य,कृषि एवं व्यवस्थित नगर-निर्माण, भवन-निर्माण के साथ-साथ श्रेष्ठ शिल्पकला, चित्रकला, मूर्तिकला तथा अपनी विश्व-प्रसिद्द संस्कृति एवं सबसे लचीला और उदारवादी धर्म के लिए प्रसिद्द थी आज भी भारत की सभ्यता में यह गुण पाया जाता है यहाँ के धर्म में देवी-देवताओं की मूर्ति-पूजा,पीपल,तुलसी आदि वनस्पतियों की पूजा इत्यादि सिन्धुकालीन सभ्यता की अनमोल देन है, क्योंकि पुरातत्व-विभाग ने खुदाई में जो मूर्तियाँ एवं अन्य वस्तुएं प्राप्त की हैं, वह हिन्दू-धर्म से शत-प्रतिशत मेल खातीं हैं
अतः मैं आज से महान भारतीय संस्कृति और सभ्यता में पूज्यनीय देवी-देवताओं का एक-एक कर परिचय देती रहूंगी और वर्तमान भारत में सम्बंधित देवी-देवताओं का मंदिर किस राज्य में और कहाँ विद्यमान हैं, उसकी भी जानकारी दूंगी आज मैं से अपने गृह-राज्य झारखंड की प्रसिद्द छिन्नमस्तिका मंदिर, रजरप्पा से ये श्रृंखला आरम्भ कर रही हूँ:-

आज की देवी: -
.माँ छिन्नमस्तिका
एक बार भगवती भवानी अपनी सहचरियों- जया और विजया के साथ मन्दाकिनी में स्नान करने के लिए गयीं वहां स्नान करने पर क्षुधाग्नि से पीड़ित होकर वें कृष्ण-वर्ण की हो गयीं। उस समय उनकी सहचरियों ने उनसे कुछ भोजन करने के लिए माँगा। देवी ने उनसे कुछ क्षण प्रतीक्षा करने को कहा। कुछ समय प्रतीक्षा करने के पश्चात् पुनः याचना करने पर देवी ने पुनः प्रतीक्षा करने के लिए कहा। बाद में उन देवियों ने विनम्र स्वर में कहा कि 'माँ तो शिशुओं को भूख लगने पर तुरंत भोजन प्रदान करती है।' इसप्रकार उनके मधुर वचन सुनकर कृपामयी माँ ने तत्क्षण अपने कराग्र (तलवार) से अपना सिर काट लिया। कटा हुआ सिर देवी के बाएं हाथ में आ गिरा और कबंध से तीन धाराएँ निकलीं। वे दो धाराओं को अपनी दोनों सहेलियों की ओर प्रवाहित करने लगीं, जिसे पीतीं हुई वे दोनों बहुत प्रसन्न होने लगीं और तीसरी धारा जो ऊपर की ओर थी, उसे वें स्वयं पान करने लगीं। तभी से यें छिन्नमस्तिका कही जाने लगीं।











माँ छिन्नमस्तिका का मंदिर भारत के झारखंड राज्य के गोला क्षेत्र के पास रजरप्पा-धाम में स्थित है। कहा जाता है कि माँ छिन्नमस्तिका कि मूर्ति हजारों साल पुरानी है। यहाँ जो भी मन्नत मांगी जाती है, वह अवश्य हीं पूरी होती है। इसलिए यहाँ दूर-दूर से लोग माँ का दर्शन करने आते हैं। यहाँ माँ की पूजा-अर्चना की जाती है तथा मन्नत मांगे जाते है। सभी की मनोकामनाएँ माँ पूरी करती हैं। अतः यहाँ सालों भर भीड़ लगी रहती है।










इस स्थान का धार्मिक महत्व तो हैं हीं, साथ-हीं यहाँ का प्राकृतिक सौंदर्य भी मनमोहक है। जहाँ भैरवी नदी दामोदर नदी में समाहित होती है, वहां का दृश्य देखतें-हीं बनता है। दूर-दूर से लोग इसकी सुन्दरता को देखने आते हैं। जो भी यहाँ आता है, यहीं का हो जाता है।











संक्षेप में, हम यह कह सकतें हैं की रजरप्पा-धाम का वातावरण धार्मिक और प्राकृतिक दोनों हीं दृष्टि से महत्त्व रखता है।