मैं अपना पहला लेखन अपनी यादों से शुरु करना चाहती हुँ। जब मैं बहुत छोटी थी ,लगभग पाँच-छह साल की तब मेरी नानी मुझे अपनी माँ से सुनी लोक -कथाएँ गाकर सुनाती थीं। मुझे सुनने में बहुत अच्छा लगता था। उन्हीं में से एक कहानी मैं आज आपको सुनाती हुँ-
एगो बुट _एक चना, बढई दण्डा_बढई को दण्डीत करना, किल फाडना_किल काटना, राजा छोडा_ राजा का त्याग करो, मंजिल बा_मंजिल है, रानी डसा_रानी को डसो, लोई _ दु:खी मन से।]
एक चिडिंया का जोडा परदेश जाने के लिए एक चना ले जा रहा था। एक चने के दो दानें निकालने के लिए वे उसे चक्की मे डालते हैं,चूकि चक्की के सामने दाना बहुत छोटा था इसीलिए चना का एक दाना बाहर और दुसरा अंदर गीर जाता है। अब चिडिंया क्या करे? परदेश कैसे जाए? क्योंकि दाना तो चक्की के किल में फंस गया था। दोनों जाकर बढई (जो लकडी काटता है ) से कहते हैं -(कही हुई बातें हमारी क्षेत्रीय भाषा मे लिखी गई है )
बढई-बढई किला फाडा, किल मे मंजिल बा,
का खाँउ का पिऊँ, का ले के परदेश जाऊँ?
बढई - एगो बुट(चना) के दाल खातिर हम किला फाडें जाऊँ!
तब दोनों चिडियाँ राजा के पास जाते हैं और कहते हैं-
राजा- राजा बढई दण्डा, बढई ना किल फाडें, किल में मंजिल बा,
का खाऊँ का पिऊँ, का ले के परेदेश जाऊँ?
राजा कहता है- एगो बुट के दाल खातिर हम बढई दण्डे जाऊँ!
फिर दोनों चिडियाँ रानी के पास जाते हैं और कहते हैं -
रानी रानी राजा छोडा, राजा ना बढई दण्डे,
बढई ना किल फाडें, किल मे मंजिल बा,
का खाऊँ का पिऊँ, का ले के परेदेश जाऊँ?
रानी कहती है- एगो बुट के दाल खातिर हम राजा छोडें जाऊँ!
अब दोनों चिडियाँ साप के पास जाते है फिर कहते हैं -
सरपा-सरपा (साँप) रानी डसा, रानी ना राजा छोडें,
किल में मंजिल बा, का खाऊँ का पिऊँ का ले के परदेश जाऊँ?
साँप कहता है- एगो बुट के दाल खातिर हम रानी डसे जाऊँ!
वे दोनों परेशान हो गयें और बहुत सोचने के बाद लाठी के पास गयें और बोलें-
लउरी-लउरी (लाठी) सरपा पीटा, सरपा ना रानी डसे,
रानी ना राजा छोडें, राजा ना बढई दण्डे,
बढई ना किल फाडें, किल में मंजिल बा,
का खाऊँ का पिऊँ का ले के परदेश जाऊँ?
लाठी कहता है- एगो बुट के दाल खातिर हम सरपा पीटे जाऊँ!
चिडिंयाँ परेशान हो गई और जाकर आग (भार) से बोली-
भार भार लऊरी जारा(जलाना), लऊरी ना सरपा पीटे,
सरपा ना रानी डसे, रानी ना राजा छोडे, राजा ना बढई दण्डे,
बढई ना किल फाडे, किल मे मंजिल बा,
का खाऊँ का पीऊँ का ले के परदेश जाऊँ
आग भी वही कहता है जो सभी कहते हैं। फिर चिडिंयाँ समुद्र और हाथी के पास जाती है और वहाँ पर भी उन्हें वही जवाब मिलता है। उसके बाद एक छोटी मकडी आकर कहती है कि उसकी भी कोई नहीं सुनता, लेकिन मैं तुम्हारी मदद कर सकती हुँ। दोनों चिडिंयाँ खुश हो गईं। मकडी ने अपना काम शुरु किया, हाथी को अपने जाल में फांसने लगा। हाथी घबरा गया और बोला-
हमरा छाना-ऊना (फसाना) जानो कोई हम समुद्र सोखब लोई।
समुद्र - हमरा सोखअ-ऊखअ जानो कोई हम भार बुझायब लोई।
भार- हमरा बुझाव-ऊझाव जानो कोई हम लउरी जारब लोई।
लऊरी- हमरा जारा-ऊरा जानो कोई हम सरपा पीटब लोई।
सरपा - हमरा पीटअ-ऊटअ जानो कोई हम रानी डसब लोई।
रानी - हमरा डसअ-ऊसअ जानो कोई हम राजा छोडब लोई।
राजा- हमरा छोडअ-उडअ जानो कोई हम बढई दण्डब लोई।
बढई - हमरा दण्डअ-ऊण्डअ जानो कोई हम किला फाडब लोई।
चक्की का किल भी कहता है-
हमरा फाडअ-उडअ जानो कोईहम अपने फटब लोई।
दोनों चिडिंयाँ बहुत खुश हुईं और वे दोनों दाना लेकर परदेश चले गए। कहानी का आशय यही है कि चिडिंयाँ दाना लेकर परदेश जाना चाहती है। और दाना चक्की के किल में फंस जाता है, जिसे निकालने के लिए बढई, राजा, रानी, साँप, लाठी, आग, समुद्र और हाथी कि मदद ली जाती है। सभी इन्कार कर देते हैं और अन्त मे सहायता करती है- एक मकडी जिसकी मदद से चिडिंयाँ अपनी मंजिल को पा लेती है।
इस कहानी से हमें यही सीख मिलती है कि छोटे होने से कोई कमजोर नहीं होता और बडा होने से कोई ताकतवर नहीं होता, विजय तो उनके साहस पर निर्भर करती है। ऐसी हीं कहानियों से हमें बहुत-सी सीख मिलती है जो हमारे जीवन में उपयोगी होती है। आशा करती हूँ कि मेरी कहानी आपको पसन्द आई होगी। आपको ये कहानी कैसी लगी लिख भेजियगा।


