मेरे और मेरे सहयोगियों की ओर से पूरे विश्व के लोगों को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं।
शनिवार, 31 दिसंबर 2011
शनिवार, 1 अक्टूबर 2011
गुरुवार, 1 सितंबर 2011
गणेश चतुर्थी
देश-विदेशों में बसे सभी गणेश भक्तों को मेरे और मेरे साथियों की ओर से बहुत-बहुत शुभाकामनाएँ। बुद्धि के देवता गजानन से मैं यही प्रर्थना करता हूँ कि हे प्रभू! आप पथ-भ्रष्ट विश्व को सद्मार्ग दिखाओ। आज पूरा विश्व आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक और आतंकवादी समस्याओं से ग्रस्त है। देव-भूमि भारत भी आज इससे मुक्त नहीं है। अतः हे विघ्न्हर्ता, मंगलकर्ता, भक्त-वत्सल, सिद्धि-विनायक भगवान श्री गणेश! आप हीं अपनी कृपा-वृष्टी(वर्षा) से मानव-जाति में सत्य, अहिंसा, दया, करुणा और प्रेम की गंगा को सुखने से बचा सकते हो। हे प्रभू! आपकी असीम कृपा की ज़रुरत है इसलिए कभी रुष्ट न होना।
जै श्री गणेश!
ईद की हार्दिक शुभकामनाएँ
विश्व के कोने-कोने में बसे सम्पुर्ण मुसलमान भाईयों और बहनों को मेरे और मेरे साथियों की ओर से ईद की ढेर सारी शुभकामनाएँ। मैं यही कामना करता हूँ कि रमज़ान का महिना और ईद का महान पर्व जिसप्रकार पवित्रता और ख़ुशियों से लोगों को परिपूर्ण कर देता है, उसीप्रकार यह पर्व लोगों के जीवन में प्रेम, सद्भाव, शाँति, सफलता, समृद्धि एवं विश्वास और दया का भाव उत्पन्न करें। मैं ऊपर वाले से यही प्रार्थना करता हूँ कि हे, पर्वरदिगार! सबको सद्बुद्धि दे और अपने संतानों पर सदा अपनी कृपा बनाए रखना।
ईद मुबारक!
मंगलवार, 23 अगस्त 2011
श्री कृष्ण-जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएँ
श्री कृष्ण-जन्माष्टमी के शुभ अवसर पर पूरे विश्व में बस रहे भारतवासियों को मेरे और मेरे सहयोगियों द्वारा ढेर सारी शुभकामनाएँ। मैं आज भगवान श्री कृष्ण से प्रर्थना करता हूँ कि हे! प्रभु, सभी को सद्बुद्धी दें कि भारत में उत्पन्न भ्रष्टाचार से सम्बन्धित मुद्दा शाँतिपूर्ण तरिके से हल हो जाये क्योंकि मुझे संदेह है कि गाँधीवाद की आड़ में अन्ना टीम पुरे संसदीय व्यवस्था को हीं न समाप्त कर दे। कहीं हमारा संविधान अपना मूल रुप न खो दे। मुझे प्रतीत होता है कि J.P. आंदोलन के नक्शे कदम पर चलते हुए अन्ना टीम भारत में माओवाद या लेनिनवाद के समान अन्नावाद बनाकर पूरे सत्ता पर काविज़ न हो जाए क्योंकि हमारे देश की अधिकांश जनता संविधान की बारीकियों को नहीं समझती हैं। वे भ्रष्टाचार से त्रस्त हैं। ऐसे में वें कोई भी स्वार्थी या निःस्वार्थी तत्वों का साथ दे सकती हैं इसलिए भगवान श्री कृष्ण से मैं पुनः प्रार्थना करता हुं कि हे! प्रभु, द्रौपदी की लाज के समान मेरे शहिदों और महापुरुषों द्वारा बनाए गए संविधान की रक्षा करना और विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र को अपने स्वभाविक रुप में बनाए रखना।
जय, श्री कृष्ण!
[तस्वीरें,- गूगल के साभार]
सोमवार, 15 अगस्त 2011
आज़ादी की 65 वीं वर्षगांठ
मैं अपने और अपने सहयोगियों की ओर से सम्पूर्ण भारतवासियों और विदेशो में बसे भारतीय मूल के निवासियों के साथ-साथ सैकड़ो वर्षो से बिछड़ चूके भारतवंशियों को भारत की आज़ादी के 65 वें वर्षगांठ पर बहुत-बहुत बधाइयाँ देता हूँ और ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि यह आजादी हमेशा बनी रहे और भारतवासी विश्व के कोई भी कोने में हो ईश्वर उन्हें सुख, शांति, समृद्धि और राष्ट्र-प्रेम की भावना जागृत करें.
आज मुझे अत्यंत खुशी है और गर्व का अनुभव हो रहा है कि जिस आज़ादी रुपी दुल्हनियाँ का आगमन 15 अगस्त 1947 को हुआ था, वह आज धन-धान्य, सुख-शान्ति, समृद्धि और सौभाग्य से युक्त होकर अपनी उम्र के 65वें वसन्त तक पहुँच चूकी हैं। इन 65 वर्षों में कई बार इसकी स्मिता और आबरु पर कभी घर के हीं लोगों ने डाका डाला तो कभी विदेशी शक्तियों और पड़ोंसियों ने अपने नापाक इरादे से आक्रमण किया। फिर भी गाँधी के त्यागों और अनगिनत शहिदों के रक्त से सिंचित हमारी मातृभूमि अपनी अखण्डता और अक्षुण्ता को बनाए रखी है।अत: हमारा सविनय आग्रह उन सभी भाई-बहनों से जिन्होंने कुछ सैद्धांतिक और आपसी मतभेदों के कारण हमारे समाज के मुख्य धारा से अलग हो गये हैं, उन्हें मैं पुनः मुख्य धारा में शामिल होकर इस मातृभूमि की आज़ादी और शहिदों के बलिदानों की लाज बचाने केलिए आमंत्रित करता हूँ, क्योंकि मुझे ऐसा लग रहा है कि कुछ स्वार्थी तत्व भारत के लोकतांत्रिक और संसदीय व्यवस्था को हानि पहुँचा सकते हैं।
अतः आज के इन विषम परिस्थितियों में सभी मातृभूमि के संतानों का एकजूट होकर विश्व की सबसे बड़ी प्रजातंत्र की रक्षा करने की आवश्यकता है। भारत का संविधान विश्व का एक आदर्श संविधान है, इसलिए हमें संसदीय प्रणाली आम चूनाव और आम सहमति से भ्रष्टाचार से लेकर लोकपाल विधेयक जैसे समस्त मुद्दों का हल निकालना चाहिए। हमें जनप्रतिनिधियों, पत्रकारों, विद्वानों, विश्लेषकों तथा स्वविवेक और धैर्य से काम लेना चाहिए, क्योंकि जल्दबाज़ी में उठाये गये कदम किसी भी दॄष्टी से उचित एवं न्याय-संगत नहीं माना जा सकता। जैसा कि रामायण में [भगवान श्रीराम ने लक्ष्मण को] लक्ष्मण भरत और उनके साथ आ रही सेना को देखकर यह अनुमान लगा लिया कि भरत हमारे [राम,लक्ष्मण और सीता के] ऊपर आक्रमण करने आ रहें हैं। ऐसे में लक्ष्मण ने अपने प्रभु श्रीराम की जान की सुरक्षा केलिए चिंतित होकर भरत को हीं मारने केलिए धनुष तान दी और श्रीराम की एक भी बात सूनने को तैयार नहीं हुए तो श्रीराम ने कहा_"लक्ष्मण! कभी-कभी आँख से देखा और कान से सूना भी गलत होत है।" और आख़िर हुआ भी यही कि भरत राम को वापस अयोध्या वापस ले जाना चाहते थें।
शायद कहीं यही हाल हमारे साथ न हो जाए, कि जिसे हम अपना दूसरा गाँधी शिवाजी और भगत सिंह मान रहें हैं, वह कुछ और न निकल जाएं। इसलिए हमें सोच-समझ्कर केवल संवैधानिक और प्रजातांत्रिक तरिकों से हीं सरकार को भ्रष्टाचार और लोकपाल केलिए मज़बूर करनी चाहिए। मेरा निज़ी विचार है कि सरकार को अपने प्रस्ताव के साथ सिविल सोसायटी, विपक्ष, पत्रकारों, विद्वानों और विश्लेषकों के प्रस्ताव को एकसाथ विभिन्न बिन्दुओं में छ्पवाकर उसपर आम मतदान कराये जाएं और फिर संसद पर रखकर उसके मुख्य बिन्दुओं पर चर्चा करवाकर एक सर्वमान्य कानून का रुप दिया जाना चाहिए। मेरा मानना है कि कोई भी कानून संसद के अन्दर हीं बनना चाहिए तभी लोकतांत्रिक व्यवस्था बनी रहेगी अन्यथा हम अपने समृद्ध लोकतंत्र को खो सकते हैं।
जय हिंद!
[तस्वीरें,- गूगल के साभार]
रविवार, 24 अप्रैल 2011
श्री सत्य साईं बाबा को एक भक्त की श्रद्धांजलि
यह सुन कर अत्यंत दुख है की श्री सत्य साईं बाबा इस दुनिया में अब नहीं रहें. मैं अपने और अपने टीम-सदस्यों की ओर से उन्हें श्रद्धा-सुमन श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ. आज जरूरत है धैर्य और शांति से उनके वचनों को याद करने की और एकाग्रचित्त हो कर उनके सांसो को महसूस करने की, जो उन्होंने 85 वर्ष तक इस प्रदूषित वातावरण में अपने पवित्र सांसो से लोगों के ह्रदय को दूषित होने से बचाया. उन्होंने सर्व-धर्म एकता और मानव धर्म की, जो शिक्षा हमें दिया है, आज जरुरत है उसकी रक्षा करने की. उन्होंने कभी भी जाति, भाषा, धर्म, संप्रदाय और देश-विदेश के लोगों में भेद-भाव नहीं किया. वे सच्चे अर्थों में ईश्वर के अवतार थे. उनका आशीर्वाद और कृपा सब पर था, है और हमेशा रहेगा. मैं एक बार फिर भारत समेत 114+ देशों में रहने वाले साईं भक्तो को सांत्वना देना चाहता हूँ कि साईं इस दुनियां से गए नहीं हैं, वो हमेशा हमारे हृदय में निरंतर धड़कते रहेंगे. हमें इंतजार है 2024 की, जब सत्य साईं बाबा प्रेम साईं के रूप में अवतरित होंगे. अतः अब हमारा परम कर्त्तव्य और उनकी आज्ञा है कि उनकी अनुपस्थिति में उनके बताये मार्गों पर चल कर उनकी इच्छा और सपनों को साकार करें.
जय, ॐ साईं
शुक्रवार, 22 अप्रैल 2011
HAPPY GOOD-FRIDEY

विश्व के प्रत्येक कोने में रहने वाले ईसाई भाइयों एवं बहनों को गुड-फ्राइडे का बहुत-बहुत बधाई और हार्दिक शुभकामनाएं देता हूँ और कामना करता हूँ की प्रभु ईसा सबके ह्रदय में दया और प्रेम की भाव जगाएं. आधुनिक संसार में सबसे बड़ी समस्या मानवता का पतन और करूणा का अभाव है. इसलिए दयामूर्ति ईसा-मसीह से मैं यही प्रार्थना करता हूँ कि हे प्रभु ! तुम जन-जन के मन में प्रेम, दया, बंधुत्व और अपनत्व का भाव उत्पन्न करो और अपने आशीर्वाद से सूर्य के समान लोगों के ह्रदय में सत्य, ज्ञान और प्रेम का प्रकाश प्रज्वलित करो !गुरुवार, 21 अप्रैल 2011
झारखण्ड ख़ूनी क्रांति की ओर!
सेवा में, दिनांक - 21अप्रैल 2011
समाजसेवी, बुद्धिजीवी एवं नेतागण
विषय: अतिक्रमण पर फैसला और झारखण्ड के लोगों को तबाही से बचाने की अपील.
मैं झारखण्ड सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त NGO (अलख-कामेश्वर मेमोरिअल संस्थान, Reg.No . 489) का सचिव हूँ .मेरा ई-मेल भेजने का मुख्य उद्देश्य आपके ध्यान को झारखण्ड राज्य के सर्वाधिक उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों में से एक बेरमो प्रखंड (जिला बोकारो) समेत पुरे कोयलांचल की ओर आकृष्ट करना है. यहाँ के लगभग 60 -70 % लोग विशेष कर गरीब तथा पिछड़े वर्ग के हैं जो उग्रवादी बनने के लिए तैयार हो रहें हैं. इसका मुख्य कारन झारखण्ड उच्च न्यायलय (रांची) का वह आदेश है जिसके तहत C.C.L., B .C .C .L . तथा S.A.I.L. अपनी जमीन पर से उनलोगों को जबरन हटा रही है जो आजादी के पहले से बसे हैं. यहाँ के अधिकांश लोग- ठीका मजदूर, ट्रक, ऑटो चालक, खटाल चलाने वाले, खुदरा व्यापारी, मिस्त्री (machanic) तथा रिटायर हो चुके कर्मचारी या उनके परिवार के लोग रहते है. वे अपने द्वारा निर्मित छोटे-छोटे झोपड़ीनुमा घरों या C.C.L या B .C .C .L के रिजेक्ट क्वार्टर में मरम्मत करा कर किसी तरह गुजारा कर रहें हैं. यहाँ के निवासियों को C.C.L. प्रबंधक तथा नेताओं द्वारा शुरू से हीं आश्वासन दिया जाता रहा हैं कि आवश्यकता पड़ने पर ये कम्पनियाँ उनका पुनर्वास कराएगी. लोग इस आश्वासन पर विश्वाश कर जीवन भर की कमाई इन घरों और अपने व्यापार में लगा चूकें हैं. वे अपने छोटे आमदनी से बच्चों को महंगाई के इस दौर में किसी तरह पढ़ा रहें हैं. उनका एक हीं उम्मीद है कि बच्चें इस कोल फील्ड में अच्छे शैक्षणिक एवं तकनीकी शिक्षा प्राप्त कर अपना और अपने परिवार का भविष्य उज्जवल करेंगे परन्तु जैसे हीं उनके हाथों में यह नोटिस आया कि 48 से 72 घंटों के भीतर ज़मीन तथा घर ख़ाली कर दें अन्यथा प्रशासन कि मदद से बल-पूर्वक उन्हें और उनके सामान को फ़ेंक दिया जायेगा अन्यथा सामान सहित तोड़ दिया जायेगा. इस नोटिस के बाद चारों और सन्नाटा और मातम फैल चूका है. कुछ घरों में चूल्हे भी नहीं जल रहें हैं. लोग व्याकुल होकर इधर-उधर स्थानीय नेताओं से मिल रहें हैं और एक-एक कि.मी. कि दुरी पर मीटिंग कर रहें हैं. उन्हें यह समझ में नहीं आ रहा कि वें क्या करें? स्थानीय नेताओं से उदासीन और मायूस होकर स्वयं अगला कदम बढ़ाने के लिए तैयार हो रहें हैं. उन्हें चिंता है कि इतने कम समय में जीवन-भर की कमाई से अर्जित जरुरत कि चीजों जैसे,- टी.वी., फर्नीचर या अन्य छोटे-मोटे उपभोक्ता वस्तुओं को कैसे बचाएं? उनके पास किराये पर जाने तक कि हैसियत नहीं हैं. वे मायूस होकर रोने लगते हैं. कुछ लोगों कि तबियत भी ख़राब हो चुकी हैं. इलाज के दौरान भी वे अपने भविष्य को देखकर और अधिक बीमार होते जा रहें हैं. 16 /4 / 20011 को B .C.C.L. के मकान में रहने वाला एक व्यक्ति अपने घर को टूटते देख सद्दमें से मर चूका .
10वीं और 12वीं कि परीक्षा झारखण्ड में चल रही हैं परन्तु इस स्थिति में बच्चें भी पढ़ने में असमर्थ हैं. बेरमो और पुरे कोयलांचल में ऐसा कोई भी भूमि नहीं है, जहाँ लोग कुछ समय के लिए रह सकें. क्योंकि इस क्षेत्र में लगभग सभी भूमि रेलवे , B.C.C.L., D .V .C , फोरेस्ट,या रैयतों द्वारा अधिकृत है अतः ये संस्थाएं किसी भी स्थिति में अपनी भूमि पर किसी को अस्थायी रूप से भी रहने देने की इजाजत नहीं दे रही है. जबकि कुछ लोग C.C.L., B.C.C.L., S.A.I.L.( बोकारो इस्पात) के विस्थापित हैं जिन्हें उच्चतम न्यायालय के आदेश के बाद भी न तो नौकरी प्राप्त हुआ है और न हीं ज़मीन या पुनर्वास की गयी है.ऐसे में उन्हें उग्रवादी बनने या आत्म हत्या करने के सिवाए कोई रास्ता नहीं दिख रहा हैं . ऐसे में वे हथियार उठा लेते हैं तो इसका जिम्मेवार कोन होगा कोर्ट या झारखण्ड सरकार ? जब की अतिक्रमण के नाम पर पुरे झारखण्ड में लोगो को सताया जा रहा हैं. अतः यंहां के लोग आप और न्याय के मंदिर से पूछना चाहते हैं:-
(1) यदि कोई नागरिक किसी सरकारी भूमि पर रहता है तो उसे अवैध कब्ज़ा कह कर हटा दिया जाता है .चाहे वह 10 वर्षों से रह रहा हो या 60 वर्षों से .जबकि कोई आम आदमी के ज़मीन पर कोई व्यक्ति 12 वर्षों या इससे अधिक समय तक रह जाता है तो उस मकान या भूमि का मालिकाना हक़ हस्तांतरित होकर रहने वाले के नाम पर हो जाता है. अतः ऐसे में कंपनी/सरकार और नागरिकों में यह कैसा भेद है ?
(2) यदि सरकारी भूमि को 48 से 72 घंटों के अन्दर ख़ाली करने का उच्च या उच्चतम न्यायालय आदेश जारी कर देती है और प्रशासन की मदद से ख़ाली भी करा दिया जाता है. तो एक विश्थापित के पक्ष में अदालत ऐसा फरमान जारी क्यों नहीं कराती ?
(3) विस्थापित को पुनर्वास तथा नौकरी शीघ्र-अति-शीघ्र अर्थात 48 से 72 घंटे के अन्दर क्यों नहीं दिलवाती? क्या अदालत गरीब और असहाय जनता को अपना रुतबा और पावर दिखलाना चाहती है और अमीरों तथा सरकारी या गैर- सरकारी .कंपनियों का हितैषी बनाना?
(4 ) क्या अदालत का आदेश मानव-कल्याण, जनता के सुख - शांति और नैतिकता से ऊपर है?
आप सभी राष्ट्र-भक्तों से अपील हैं की आप झारखण्ड को बचा लें. क्योंकि न्यूजपेपर से पता चला हैं की लगभग 1 ,49 ,००० लोग प्रभावित हैं और उनके समर्थन में M .C .C, 23 अप्रैल को झारखण्ड बंद का ऐलान कर चुके हैं . अगर इतने लोग M .C .C के साथ हो गए या उन्हें चंदा देने लगे तो झारखण्ड का क्या होगा ? यह सोच कर डर लगता हैं! अतः मैं बार-बार सभी समाजसुधारको और राष्ट्र-भक्तों से गुज़ारिश कर रहा हूँ कि आप झारखण्ड को उजड़ने से बचा लें.
जय हिंद !
गुरुवार, 14 अप्रैल 2011
मंगलवार, 12 अप्रैल 2011
रामनवमी की हार्दिक शुभकामनाएं !
सभी भारतीय एवं विश्व के भाई-बहनों को रामनवमी की हार्दिक शुभकामनाएं एवं स्नेह. आज का पावन दिन हमें राम के व्यक्तित्व एवं उनके चरित्र से कुछ सिखने के लिए प्रेरित करता है. आज के भाग-दौड़, स्वार्थी एवं व्यक्तिवादी जीवन-शैली में राम के आदर्शों का पुरे मानव-जाति को अपनाने की आवश्यकता है. आधुनिक जीवन-शैली में जहाँ पुरुष अपना धर्म, कर्त्तव्य, मर्यादा एवं उच्च आदर्शों के साथ अपने पुरुषार्थ को खोता चला जा रहा है वहीं महिलाएं अपनी त्याग एवं ममता रूपी छवि नष्ट करने लगीं हैं. प्रत्येक व्यक्ति आज केवल अपने स्वार्थ और आर्थिक लाभ की चिंता करने लगा है. लोग केवल सत्ता-प्राप्ति और झूठे प्रसिद्धि प्राप्त करने के लिए गांधीवादी और जनवादी बनने का स्वांग रच रहें हैं जो किसी भी दृष्टि से राष्ट्र व मानव हित में नहीं है. अतः आज आवश्यकता है,- श्रीराम को अपने जीवन में आत्मसात करने की.
जय श्रीराम !
सोमवार, 11 अप्रैल 2011
शनिवार, 2 अप्रैल 2011
रविवार, 20 मार्च 2011
HAPPY HOLI
सभी भारतवासियों, प्रवाशी- भारतीयों और भारतीय संस्कृति के प्रति आस्था रखने वाले विदेशी भाई-बहनों को मेरे एवं मेरे सहयोगियों की ओर से होली की हार्दिक शुभकामनाएं एवं बधाई. रंगों का यह महापर्व हमें बड़े, बुजुर्ग, बच्चें तथा स्त्री -पुरुष के भेदभाव को दूर कर एक रंग प्रदान करता है. यह पर्व हम सभी को गुलाल और कृत्रिम रंग में रंग देता है. जो इस भावना का प्रतीक है की पृथ्वी पर न तो कोई गोरा है न कोई काला, सभी किसी बगीचे के फूल के समान है. जो अलग-अलग रंगों में उपस्थित हो कर प्रकृति की सुन्दरता में चार-चाँद लगाते हैं. यदि पृथ्वी रूपी बगीया में अलग-अलग रंग न होता तो शायद इस पृथ्वी की सुन्दरता वो न होती जो आज है. हमारे देश में होली का पर्व इसी भावना से प्रेरित हो कर मनाया जाता है. होली में जाति निरपेक्षता तथा धर्मनिरपेक्षता की भावना होती है. शायद होली हीं एक ऐसा पर्व है जो जाति, धर्म, मुल्क और रंग-भेद से मुक्त हो कर मनाया जाता है. इस दिन न तो कोई राजा होता है और न कोई भिखारी. आज के दिन सभी एक साथ मिल कर रंग खेलते हैं. हर घर के लोग इस पर्व में शामिल हो कर हुर्दंग मचाते हैं और एक दुसरे को छेड़ते और उनके साथ हंसी-मजाक किया करते हैं. संक्षेप में कहे तो, समाज और मानवता को जोड़ने के साथ-साथ यह पर्व नए -पुराने पीढ़ियों को खुल कर अपनी भावना व्यक्त करने एवं एक-दुसरे को समझने का अवसर देता है, एक अर्थ में यह पर्व janreshan-gaip की आधुनिक समस्या को दूर करने में भी सार्थक है. इसलिए मैं इस पर्व को विश्व का सबसे बड़ा और महान पर्व मानता हूँ. यदि इस पर्व को पूरी दुनियां मनायें तो शायद रंग-भेद, janreshan-gaip और एक-दुसरे के प्रति नफरत जैसी समस्याएँ स्वयं समाप्त हो जाएगी.
आशा है की आज आप भी होली का महापर्व अवश्य celebrate करेंगें परन्तु इस होली की खुशियाँ और कई गुणा होती यदि जापान में प्राकृतिक आपदा न आता. पर प्रकृति के सामने हम सभी लाचार और बेबश हैं और ईश्वर से यही प्रार्थना करते हैं कि " हे प्रभु ! जो इस दुनियां में नहीं हैं , उनकी आत्मा को शांति दे और वहां के लोगो के जीवन को सामान्य बनाने की कृपा करें. " अंत में जापान और वहां के नागरिकों के लिए यही कहूँगा " live long japan !"
Happy Holi !
बुधवार, 16 मार्च 2011
जापान के लोगों के प्रति सहानुभूति और मदद कि अपील
पिछले कुछ दिनों से जापान और वहां के लोग जिस मुसीबत का सामना कर रहे हैं. वो अत्यंत पीड़ा-दायक और मार्मिक हैं. मेरा और मेरे ब्लॉग के सदस्यों की हमदर्दी और सहानुभूति उनके साथ है. हम ईश्वर से यही प्रार्थना करते हैं कि हे! प्रभु आप हर जापानी बंधुओं को इस मुसीबत से बचा लें और उन्हें इस शारीरिक और मानसिक पीड़ा से मुक्त होने की अपार शक्ति दें! मैं मानता हूँ कि जो लोग अपनों से हमेशा-हमेशा के लिए बिछड़ गएँ हैं, वो फिर से वापस नहीं आयेंगे. फिर से उन्हें बिछड़ों का साथ प्राप्त नहीं होंगा. उन बच्चों को फिर से वो माता-पिता नहीं मिलेंगें जो उनको छोड़ कर चले गएँ. उन बहनों, माताओं, और महिलाओं को वे अपने नहीं दिखेंगें, जिनके लिए न जाने कितने सपने बुने थे. पर जीवन चलने का नाम हैं जो कभी रुकता नहीं है. इसलिए मेरा सम्पूर्ण जापानियों से आग्रह है कि आप इस परीक्षा की नाजुक घड़ी में पुरे धैर्य और साहस से काम लें. क्योंकि आप तो साहसी और धैर्यवान रहें हैं. जब आप ऐटम-बम का अकेला मुकाबला कर अपनी वीरता का परिचय दे सकते हैं तो आज तो सारी दुनियां आपके साथ खड़ा हैं.
मैं अपने ब्लॉग और ट्विटर के माध्यम से पुरे धरतीवासियों से सविनय आग्रह करता हूँ कि जापान को शीघ्र-अति-शीघ्र मदद कर वहां के जन-जीवन को सामान्य बनाने में अपना पूर्ण सहयोग करें.
मैं अपने ब्लॉग और ट्विटर के माध्यम से पुरे धरतीवासियों से सविनय आग्रह करता हूँ कि जापान को शीघ्र-अति-शीघ्र मदद कर वहां के जन-जीवन को सामान्य बनाने में अपना पूर्ण सहयोग करें.
please, help them immediately!
मंगलवार, 22 फ़रवरी 2011
स्लम-बस्ती में गणतंत्र-दिवस समारोह
उन्हें प्रति-दिन के समान हीं मजदूरी और मेहनत करना पड़ता है। उन्हें यह पता नहीं कि आजादी और गुलामी है क्या? उन्हें नहीं मालूम कि एक गुलाम देश और आजाद देश में क्या फर्क होता है? शायद उन्हें यह भी नहीं पता कि
खुशियाँ क्या होती है ? क्योंकि खुशियों और छुट्टियों का आनंद तब आती हैं, जब व्यक्ति का पेट भरा होता हैं । उन्हें तो यह भी नहीं मालूम कि कल भोजन मिलेगी भी या नहीं। उनके नाम पर अनेक लोग जी रहे हैं और मस्त हो कर
गा रहे हैं- " जन-गण-मन अधिनायक जय हे ! भारत भाग्य-विधाता। " परन्तु उन बेचारों का भाग्य-विधाता कब आएगा, ये तो शायद भाग्य-विधाता हीं जानता होगा? 
गया तो पता चला कि वहां के कुछ बच्चें दस-दस रूपया चंदा कर गणतंत्र दिवस मना रहे हैं। यह देखकर हमें ख़ुशी हुई। ऐसा लगा की भारत माता के प्रति इन बच्चों के मन में विश्वाश और श्रद्धा के दीप गरीबी और विवशता रूपी
हवा के झोकों के थपेड़े खाते हुए भी तिरंगे को रोशनी देने के लिए लालायित हैं। हमने देखा कि वें गणतंत्रता का महत्व नहीं जानतें पर अपने महापुरुषों का नाम और राष्ट्रीय झंडें को सम्मान देना जानतें हैं, जो दर्द और अभाव में
भी हँसना, गाना, और नाचना जानते हैं. वे भला इस अवसर को कैसे छोड़ सकते थें। उनहोंने अपना-अपना कार्यक्रम आरंभ किया। उसी बीच मैंने देखा कि कुछ बच्चें माथे पर उपलों से भरी बोरियां ले कर बेचने आ गए। मुझे
यह देख कर दुःख हुआ कि क्या भारत के इन बच्चों को गुलामी और गरीबी से मुक्ति नहीं मिलेगी। क्या सरकारें केवल बाल-मजदूरी मुक्ति और स्कुल चलो का नारा हीं लगाती रहेंगीं ? क्या संविधान केवल कानून की किताबों में सिमट कर रह जाएगी ? वो कभी धरातल पर नहीं उतर पायेगी ? क्या गाँधी, नेहरू, सुभाष और अनंत शहीदों का सपना यही था ? क्या उनकी अभिलाषा यहीं थी की भारत का भला हो या न हो कम-से-कम हजारों-लाखों वर्ष बाद
भी लोग राष्ट्रिय अवसरों पर उनके नाम तो लेते हीं रहेंगें ? काश! वे ऐसा सोचते तो एक तरह से अच्छा ही होता क्योंकि हम न आजाद होतें और न हम आजाद देश के सपने दिखातें। कम-से-कम इतना तो संतोष अवश्य होता कि हम गुलाम हैं। इसलिए हमें सपने देखने का कोई अधिकार नहीं है. पर उनका अपना स्वार्थ था कि उन्होंने हमें आजादी दिला दी। और हम ग़रीब और लाचार जनता को छोड़ दिया, आज के निःश्वार्थ नेताओं और अधिकारियों के
हाथों में। जो अपना सब कुछ लुटा देने केलिए हमेशा तैयार होते हैं। जिन्हें न बदनामी की चिंता होती है और न अपमान का परवाह होता है। उन्हें तो बस चिंता होती है अपने और अपने ..............खैर, जो हुआ सो हुआ, अब वक्त बदल चूका है, देश का युवा-शक्ति जग रहा है और तैयार हो रहा है, एक ऐसे आन्दोलन के लिए जो छोटे बस्तियों और गाँवो से आरम्भ होगी। इस
आन्दोलन में न तो हिंसा होगी और न तख्ता-पलट होगा। इस आन्दोलन में यदि कुछ बदलेगी तो वह होगी, लोगों की मानसिकता। जिसे बदलने के लिए जागरूकता आन्दोलन चलाने की परम आवश्कता है। इस आन्दोलन का पहला कदम होना चाहिए- सरकारी योजनाओं की पूरी जानकारी आमलोगों तक पहुँचाना तथा सभी वर्गों के लोगों को शिक्षित करना, क्योंकि लगभग 80% लोगों को योजनाओं की जानकारी होती हीं नहीं है। फलस्वरूप सारी राशी
गैर-जरुरतमंदों में बाँट जाती हैं या उसके पैसे स्वार्थी तत्वों द्वारा निकाल ली जाती है। हमारे लोक-तंत्र का चौथा स्तम्भ या तो बिक जाता है या डर से गुप-चुप तमाशा देखता रहता है। यदि योजनाओं की पूरी जानकारी लोगों को दिए जाएँ तो अवश्य गरीबी और भुखमरी मिट सकती है। इस आन्दोलन में आवश्यकता है- ईमानदार और देश-भक्त सपूतों की, जरुरत है मिडियाकर्मियों की और जरुरत है, उनलोगों की जो तन, मन और धन द्वारा इस आन्दोलन में भाग लेना चाहते हैं. क्योंकि कोई भी आन्दोलन अकेला नहीं चलाया जा सकता। केवल बड़ी.-बड़ी बाते करने से भी सिस्टम नहीं बदल सकता। अतः मेरा उद्धेश ब्लॉग के माध्यम से समान विचारधारा के लोगों को एक मंच पर ला कर आन्दोलन को सफल बनाना हैं। जय हिंद!
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बुधवार, 26 जनवरी 2011
गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं
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| WE WISHES TO ALL, VERY HAPPY REPUBLIC DAY! |
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शुक्रवार, 21 जनवरी 2011
एक परिचय: भारतीय देवी-देवताओं की
यूँ तो विश्व में अनेक सभ्यता एवं संस्कृतियों ने जन्म लिया। परन्तु समय के साथ लगभग सभी सभ्यताएँ अपनी विशेषताएँ एवं पहचान खोती चली गयी। परन्तु यदि कहीं वह संस्कृति एवं सभ्यता जीवित है तो वह भारत एवं चीन में है, क्योंकि यहाँ की सभ्यता में वह अद्भुत क्षमता है जो वक्त के साथ बदलती परिस्थितियों के अनुरूप ढलती जाती है और विश्व-बंधुत्व की नीति का अनुशरण करते हुए अपने में सभी को समाहित करती जाती है। आज के २१ वीं सदी के भारत में भी हम सिन्धु-घाटी सभ्यता को यहाँ के धर्म, रीति-रिवाज, जीवन-शैली तथा परिधानों में देख सकतें हैं।
जैसा की हम सभी जानतें हैं की सिन्धु-घाटी सभ्यता विश्व की सबसे पूरानी सभ्यता है जो अपने उत्कर्ष-काल में काफी समृद्ध एवं उन्नत थी। यह सभ्यता अपने वाणिज्य,कृषि एवं व्यवस्थित नगर-निर्माण, भवन-निर्माण के साथ-साथ श्रेष्ठ शिल्पकला, चित्रकला, मूर्तिकला तथा अपनी विश्व-प्रसिद्द संस्कृति एवं सबसे लचीला और उदारवादी धर्म के लिए प्रसिद्द थी। आज भी भारत की सभ्यता में यह गुण पाया जाता है। यहाँ के धर्म में देवी-देवताओं की मूर्ति-पूजा,पीपल,तुलसी आदि वनस्पतियों की पूजा इत्यादि सिन्धुकालीन सभ्यता की अनमोल देन है, क्योंकि पुरातत्व-विभाग ने खुदाई में जो मूर्तियाँ एवं अन्य वस्तुएं प्राप्त की हैं, वह हिन्दू-धर्म से शत-प्रतिशत मेल खातीं हैं।
अतः मैं आज से महान भारतीय संस्कृति और सभ्यता में पूज्यनीय देवी-देवताओं का एक-एक कर परिचय देती रहूंगी और वर्तमान भारत में सम्बंधित देवी-देवताओं का मंदिर किस राज्य में और कहाँ विद्यमान हैं, उसकी भी जानकारी दूंगी। आज मैं से अपने गृह-राज्य झारखंड की प्रसिद्द छिन्नमस्तिका मंदिर, रजरप्पा से ये श्रृंखला आरम्भ कर रही हूँ:-
आज की देवी: -
एक बार भगवती भवानी अपनी सहचरियों- जया और विजया के साथ मन्दाकिनी में स्नान करने के लिए गयीं। वहां स्नान करने पर क्षुधाग्नि से पीड़ित होकर वें कृष्ण-वर्ण की हो गयीं। उस समय उनकी सहचरियों
ने उनसे कुछ भोजन करने के लिए माँगा। देवी ने उनसे कुछ क्षण प्रतीक्षा करने को कहा। कुछ समय प्रतीक्षा करने के पश्चात् पुनः याचना करने पर देवी ने पुनः प्रतीक्षा करने के लिए कहा। बाद में उन देवियों ने विनम्र स्वर में कहा कि 'माँ तो शिशुओं को भूख लगने पर तुरंत भोजन प्रदान करती है।' इसप्रकार उनके मधुर वचन सुनकर कृपामयी माँ ने तत्क्षण अपने कराग्र (तलवार) से अपना सिर काट लिया। कटा हुआ सिर देवी के बाएं हाथ में आ गिरा और कबंध से तीन धाराएँ निकलीं। वे दो धाराओं को अपनी दोनों सहेलियों की ओर प्रवाहित करने लगीं, जिसे पीतीं हुई वे दोनों बहुत प्रसन्न होने लगीं और तीसरी धारा जो ऊपर की ओर थी, उसे वें स्वयं पान करने लगीं। तभी से यें छिन्नमस्तिका कही जाने लगीं।
ने उनसे कुछ भोजन करने के लिए माँगा। देवी ने उनसे कुछ क्षण प्रतीक्षा करने को कहा। कुछ समय प्रतीक्षा करने के पश्चात् पुनः याचना करने पर देवी ने पुनः प्रतीक्षा करने के लिए कहा। बाद में उन देवियों ने विनम्र स्वर में कहा कि 'माँ तो शिशुओं को भूख लगने पर तुरंत भोजन प्रदान करती है।' इसप्रकार उनके मधुर वचन सुनकर कृपामयी माँ ने तत्क्षण अपने कराग्र (तलवार) से अपना सिर काट लिया। कटा हुआ सिर देवी के बाएं हाथ में आ गिरा और कबंध से तीन धाराएँ निकलीं। वे दो धाराओं को अपनी दोनों सहेलियों की ओर प्रवाहित करने लगीं, जिसे पीतीं हुई वे दोनों बहुत प्रसन्न होने लगीं और तीसरी धारा जो ऊपर की ओर थी, उसे वें स्वयं पान करने लगीं। तभी से यें छिन्नमस्तिका कही जाने लगीं।माँ छिन्नमस्तिका का मंदिर भारत के झारखंड राज्य के गोला क्षेत्र के पास रजरप्पा-धाम में स्थित है। कहा जाता है कि माँ छिन्नमस्तिका कि मूर्ति हजारों साल पुरानी है। यहाँ जो भी मन्नत मांगी जाती है, वह अवश्य हीं पूरी होती है। इसलिए यहाँ दूर-दूर से लोग माँ का दर्शन करने आते हैं। यहाँ माँ की पूजा-अर्चना की जाती है तथा मन्नत मांगे जाते है। सभी की मनोकामनाएँ माँ पूरी करती हैं। अतः यहाँ सालों भर भीड़ लगी रहती है।
इस स्थान का धार्मिक महत्व तो हैं हीं, साथ-हीं यहाँ का प्राकृतिक सौंदर्य भी मनमोहक है। जहाँ भैरवी नदी दामोदर नदी में समाहित होती है, वहां का दृश्य देखतें-हीं बनता है। दूर-दूर से लोग इसकी सुन्दरता को देखने आते हैं। जो भी यहाँ आता है, यहीं का हो जाता है।
संक्षेप में, हम यह कह सकतें हैं की रजरप्पा-धाम का वातावरण धार्मिक और प्राकृतिक दोनों हीं दृष्टि से महत्त्व रखता है।
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